ज्ञानी को अभिमान सताता है भक्त को नहीं - प्रभु संकीर्तन


प्रभु संकीर्तन -
ज्ञानी को अभिमान सताता है, भक्त को नहीं भक्ति अनेक सद्गुणों  को लाती है, भक्ति सर्व गुणों की जननी है भक्त नम्र  होता है। 

भगवान की कथा और भगवान के स्मरणसे ह्रदय को नम बनाओ और उसके मंगलमय नाम का जप करो यही कलियुग में मुक्ति पाने का मार्ग है विषयों  का बंधन मनुष्य छोड़े  तभी मन को सच्चा आनंद मिलता है सयंम और सदाचार को धीरे - धीरे बढ़ाते जाओ तो भक्ति में आनंद आएगा आचार-विचार शुद्ध होगा तो भक्ति को पुष्टि मिलेगी। 

भागवत - शास्त्र मनुष्य को काल के मुख से छुड़ाता  है काल के मुख से छूटना हो तो काल के भी काल श्रीकृष्ण के शरण में जाओ जो सर्वस्व भगवान पर छोड़ते है उनकी चिंता भगवान स्वयं करते है। 

महाभारत में एक कथा है 

युद्ध  में दुर्योधन के ताना देने पर भीष्मपितामह ने प्रतिज्ञा ली थी कि -कल मै अर्जुन को मारूँगा  या मै स्वयं मरूंगा। इस प्रतिज्ञा से सब घबराये। यह सुनकर कृष्णा भगवान को चैन नहीं आया। रात को नींद नहीं आई। भीष्म की प्रतिज्ञा सुनकर 

अर्जुन की क्या दशा हुई होगी यह सोचकर भगवान अर्जुन की स्थिति देखने आये जाकर देखा तो अर्जुन तो गहरी नींद सो रहा था भगवान ने सोचा कि  भीष्म ने ऐसी प्रतिज्ञा ली है तो भी यह शान्ति से कैसे सो रहा है उन्होंने अर्जुन को जगाया और पूछा-तुमने भी भीष्म की प्रतिज्ञा सुनी है न? अर्जुन ने कहा-हाँ ,सुनी है। 

श्रीकृष्ण ने कहा - तो तुम्हे मृत्यु का भय नहीं है, चिंता नहीं है? 

अर्जुन ने कहा-मेरी चिंता करने वाला मेरा स्वामी यानी आप है। वह जगता है इसलिए मै शयन करता हूँ वह मेरी चिंता करेगा - तो फिर मै किसलिए चिंता करू इस तरह सब ईश्वर पर छोड़ो ।मनुष्यकी चिंता जब तक ईश्वरको न हो जाये,तब तक वह निश्चिन्त नहीं होता जय जय श्री राधे कृष्णा जी।श्री हरि आपका कल्याण करें।(साभार:भगवद रहस्य 60)

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