जीवन में सत्संग का महत्व जाने-योगाचार्य स्वामी श्यामदेव

जीवन में सत्संग का महत्व जाने-योगाचार्य स्वामी श्यामदेव

"सत्संग का महात्म्य"

कोलारस-मनुष्य की भक्ति और शक्ति  सांसारिक कामों में कार्य करती है लेकिन जहां आधार है वहां केवल पुष्टि ,केवल शरणागति ही काम करती है सत्संग केवल ईश अनुग्रह है। यह मानव की किसी सत्कृति का फल नहीं है। हम मजूरी करें ,मेहनत करें और हमें सत्संग मिले ऐसा नहीं होता। सत्संग ईश अनुग्रह से ही मिलता है।
 यहां कोई जानकार व्यक्ति ,कोई ज्ञानी व्यक्ति ,अज्ञानी व्यक्ति को कुछ उपदेश देने के लिए आए हैं। यह भाव कोई ना रखें ।मैं भी श्रोता हूं मैं भी तुम्हारे सामान नीचे बैठा हूं। 

बोलता तो न जाने कौन है ।

एक महात्मा ने कहा कि इस धरती को हम कागज बनाएं तो भी भागवत गुण नहीं गा सकते हैं ।

"पृथ्वी का कागज करूं लेखनी करूं बनराय"।
"सात समुंदर स्याही करूं हरि गुण लिख्यो ना जाए"।

पृथ्वी का कागज बनाएं सारी धरती के पेड़ों की लेखनी बनाएं तो भी हरि का गुण लिख नहीं सकते। "हरि अनंत हरि कथा अनंता" गीता में कहा गया है कि ऋषियों ने और साधु-संतों ने विविध प्रकार से भगवान के गुण गाए हैं तो ऐसे ही एक महात्मा ने कहा कि प्रभु का गुणगान ना लिखा जाता है ना गाया जाता है।
पर एक महात्मा ने यह भी कहा कि

"काया कोरी कागज करूँ लेखनी करूं जिवराय। 
मन मारी स्याही करूं हरि गुण लिख्यो ही जाए "।

तो शायद परमात्मा का गुणगान हम गा सकते हैं लिख सकते हैं। मनुष्य शुभ संकल्प करें और कार्य करें तो वह संकल्प पुरी में रुक जाता है उसी शुभ संकल्प को जब हम क्रिया का स्वरूप देते हैं और किसी सुंदर भजन की रचना करते हैं तो लोग  अहमपुरी में जा कर रुक जाते हैं कि मैंने यह किया यह सजावट नहीं थी यह कार्य मैंने किया और इस से भी कोई आगे यात्रा करें हम पूरी में ना रुके तो उनको प्रवेश मिलता है शांतिपुरी में। तो उनको परम शांति मिलती है ।भजन क्या है? भगवती श्रुति कहती है कि भगवान विष्णु का भजन करना ही भजन है और यह ज्ञान यज्ञ भी तो एक प्रकार का यज्ञ है सब मिलकर कुछ करते हैं और प्रसादी के रूप में कुछ बांटते हैं कुछ प्राप्त करते हैं सबसे पहले भक्ति माता का प्रसंग महत्व पूर्ण रूप से आता है।

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