परमात्मा की खोज में हम न जाने कहां कहां भटकते, अपने अंदर उसे महसूस करने की जरूरत होती - प्रभु संकीर्तन



प्रभु संकीर्तन - परमात्मा की खोज में हम न जाने कहां कहां भटकते है, किंतु कभी अपने भीतर नही झांकते बल्कि अपने अंदर उसे महसूस करने की जरूरत होती है जिन लोगों ने अपनी आंतरिक दृष्टि विकसित कर ली है, वे महसूस करते हैं कि परम पुरुष स्वयं उनके भीतर है जब वह आपके भीतर है, तो आप उसे जानने के लिए इधर-उधर क्यों घूमते हैं आपका आचरण उस राजा की तरह है, जिसके पास सारा धन है, लेकिन वह घर-घर भीख मांगता है चारों तरफ भटकना छोड़िए उसे अपने भीतर पूरे जोश, ईमानदारी और प्रेम से खोजें वह दीप्तिमान सत्ता अपने सर्वोच्च तेज के साथ आपके हृदय में प्रकट होगी।पढ़िए।

एक ट्रक ड्राइवर था वह रोज सफर करता था कभी कहीं, कभी कहीं, उसकी भगवान् में बहुत श्रद्धा थी वह भगवान के दिव्य स्वरूप को देखना और उन से बाते करना चाहता था वह रोज सुबह शाम भगवान के मंदिर में जाता, चाहे वह कहीं वीरान जगह भी सफर क्यों न कर रहा हो उसे रोजाना कोई न कोई मंदिर मिल ही जाता जहाँ वह पूजा करता और पूरे रास्ते भक्ति संगीत सुनता रहता । 

भगवान ने उसके अंदर की तड़प देख कर उसको सही रास्ता दिखाने के लिए उसके मन में एक दिन एक विचार डाल दिया - 

जब वह ड्राइवर पूजा कर के आया तो उसने सोचा इतने साल हो गए मंदिर में जाते हुए लेकिन आज तक भगवान् से बात तक नहीं हुई, मुझसे कहीं कोई गलती हो रही है उसके मन में आया कि भगवान् तो कण कण में है और जो मंदिर में भगवान् की मूरत है वह पत्थर से बनी है और पत्थर का स्वभाव ऐसा होता है ना तो वह चल फिर सकता है ना ही बोल सकता है, मुझे ऐसे में भगवान को ढूंढ़ना चाहिए जिसमे भगवान् चलता फिरता हो, मुझसे बात भी करे । ये सोच कर वह सफर पर निकल पड़ा अब वह जहाँ भी जाता उसे रोजाना साधु संतों की मण्डली मिल जाती और वह उनके सत्संगों में जाकर उनके प्रवचन सुनता और उसे बहुत आनंद आता । एक दिन उसने एक संत से बात की उसने संत को अपने बारे में सब कुछ बताया और संत से प्रार्थना की मुझे भगवान् से मिलवाओ और उनसे बात करवाओ । 

संत ने कहा देख बेटा जब तुम परमात्मा को पत्थर की मूरत में ढूंढ़ते थे तो परमात्मा रोजाना तुम्हे मंदिर में उसी पत्थर रूप में दर्शन देते थे, अब तुम परमात्मा को इंसानो में ढूंढ़ते हो तो तुम्हे रोज हरिभक्तों के दर्शन होते है । 

लेकिन बेटा जैसे भगवान ने स्वयं गीता में कहा है - "जब तक तू मुझे और अपने को अलग - अलग समझेगा तब तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। तू यह समझ ले मैं समस्त प्राणियों की आत्मा हूँ। '' संत ने कहा बेटा जो तेरी आत्मा है वह उस हरी का ही अंश है इसलिए तू उस हरी को कहीं बाहर नहीं अपने अंदर में खोज । संत ने कहा बेटा भगवान तुझे स्वयं से मिलाना चाहता है तभी तुझे भगवान के भक्तों की शरण में आकर सत्संग और ज्ञान पाने का मौका मिला है । 

ये बातें सुनकर ड्राइवर का मन बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस संत की शरण लेकर उनसे ज्ञान लिया और सतगुरु के बताये नियम पर चलकर कुछ ही दिनों में ध्यान में लीन होकर परमात्मा के दिव्य स्वरूप को प्राप्त हो गया ।जय जय श्री राधे कृष्णा जी।श्री हरि आपका कल्याण करें। 

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