कालांतर में ब्रजवन से बन गया बिजरावन
रिपोर्ट दिनेश झा बदरवास - शिवपुरी जिले की कोलारस तहसील के अंतर्गत आने वाला एक छोटा सा गांव बिजरावन है जो जाना जाता है अपनी गढ़ी के कारण जिसके अवशेष यहां आज भी करीब 100 फीट ऊंची पहाड़ी पर देखने को मिलते हैं यह क्षेत्र में बनी गढ़ीयों में सबसे पहले बनी गढ़ी में से एक है जिसके पास में एक भव्य तीन मंजिल बावड़ी भी बनी हुई है जो उस समय में जल व्यवस्था का महत्वपूर्ण साधन हुआ करती थी, इस गढ़ी को देखकर ऐसा लगता हैं कि इसे भव्य तरीके से बनाया गया है बिजरावन के दांगी परिवार के सदस्यों ने इस स्थान के बारे में बताया कि यह गढ़ी उनके पुरखों की थी जो 12 गांव बिजरावन, मडखेड़ा, भादरौन, पचावली, लगदा, कुंवरपुर, बसाई, चिरौला, पिपरोदा, कुंवरपुर, मुढ़ेरी, चिरौला आदि के जागीरदार थे, यह नरवर के कच्छपघात राजाओं के अधीन थे, हालांकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, विदिशा, सागर, राजगढ़ और आसपास के दांगी समाज का संबंध नरवर के राजा नेपाल सिंह दांगी से रहा है और यह सभी कच्छपघात ( कुशवाहा राजपूत) वंश की ही एक शाखा थी लेकिन बिजरावन के दांगी नरवर के ही सामंत थे लेकिन बाद में दांगी (बिजरावन) और यादवों (अटलपुर) के रावसाहब का संघर्ष हुआ जिसमें यादवों ने इस गढ़ी को अपने कब्जे में तो किया लेकिन अधिक समय तक अपने अधिकार में ना रख सके, यह बाद में दांगीयों के पास वापस आ गई, लेकिन इस बार दांगियों के पास सिर्फ पांच गांव ही जागीर में शेष रह गए, हालांकि बाद में किरारों से भी इनका संघर्ष हुआ, लेकिन रघुवंशीयों से दांगियो को बराबर सहयोग मिलता रहा, दरअसल औरंगजेब के आक्रमण ने इस क्षेत्र में मजबूत शासक कच्छपघात वंश को बहुत अधिक कमजोर कर दिया जिस कारण से कच्छपघात (वर्तमान में कुशवाहा ठाकुर) वंश के शासन के बाद इस क्षेत्र में जबरदस्त राजनीतिक अस्थिरता बन गई और छोटे-छोटे राजाओं ने अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाना शुरू कर दिया इस क्षेत्र में बहुत से गढ़ और गढ़ी 15वीं शताब्दी से अस्तित्व में आना शुरू हो गए।
इसी दौरान जब ग्वालियर पर मुगलों का अधिकार स्थापित हुआ तो इस क्षेत्र में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई, नए राजा रजवाड़ों का उदय हुआ नए जागीरदार और जमींदार भी अस्तित्व में आए दांगी इस क्षेत्र में कुछ स्थानों पर ठाकुर बनाकर स्थापित हुए जिसमें बिजरावन एक महत्वपूर्ण केंद्र था। लेकिन इस क्षेत्र में अहीरों (यादवों) ने अपना अस्तित्व मजबूती से बना लिया। जिस कारण झांसी से लेकर विदिशा तक का क्षेत्र अहीरवाढ़ा कहलाता था
इस क्षेत्र में बहुत से वन थे मधुवन (वर्तमान में महुअन अशोकनगर) तुम्ववन (वर्तमान में तूमैन अशोकनगर) आमवन (वर्तमान में आवन गुना) महावन (वर्तमान में मावन गुना) तपोवन (वर्तमान में थैबन अशोकनगर) ढ़ाकवन (वर्तमान में ढ़ाकोनी अशोकनगर) और इसी क्रम में शिवपुरी जिले का ब्रजवन बहुत प्रसिद्ध वन हुआ करते थे। जो समय के साथ बदलते - बदलते बिजरावन हो गया।
बिजरावन से नौवीं शताब्दी की महिषासुरमर्दनी की मूर्ति की पूजा होती है वर्तमान नई मूर्ति भी स्थापित की गई है जिनको देखकर ऐसा लगता है कि यहां 1000 वर्ष पहले भी मंदिर थे, देवी के मंदिर अब उस स्थिति में यहां नहीं है लेकिन उसकी निशानियां देखी जा सकती हैं जो इतिहास को समझने में सहायता करती हैं और इस स्थान का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व बढ़ाती है साथी यहां बनी एक भव्य बावड़ी है जो बेहद बेहद शानदार तरीके से निर्मित तीन मंजिला इमारत के साथ बनी अपने तरीके की अनोखी बावड़ी है उल्लेखनीय यह भी है कि वर्तमान में भी वहां दांगी परिवार रहता है जो कभी इस गढ़ी में रहा करता था, यह लोग अब खेती करते हैं जहां तक कालखंड की बात की जाए तो यह गढ़ी लगभग 500 से 1000 वर्ष पुरानी हो सकती है इसे बनाने के लिए काले पत्थर चूना के साथ ईटों का भी प्रयोग किया गया है जिसमें लगा पत्थर मदनपुर के पास करही नदी से लाया गया हैं। इतिहास का यह एक ऐसा पक्ष है जिस पर बेहद कम ध्यान दिया गया है वैसे भी इतिहासकार मौखिक इतिहास का महत्व बताते हुई कहते हैं कि स्थानीय इतिहास लिखित नहीं मौखिक अधिक ही होता हैं। वर्तमान में यह गढ़ी जर्जर हालत में हैं अगर जल्द ही इसका जीर्णुद्धार नहीं हुआ तो इसका अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
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