यूजीसी, आरक्षण की प्रक्रिया, एससी-एसटी एक्ट से नाराज सवर्ण, पिछड़ा समाज भाजपा के लिये बन सकता है चुनौती - Kolaras



कोलारस -  देश में यूजीसी कानून, निर्धन सवर्णो को आरक्षण बड़ाने तथा एससी-एसटी एक्ट के दुरूपयोग से देष भर में निवास करने वाले सवर्ण एवं पिछड़ा वर्ग के लोगो में खासी नाराजगी देखने को मिल रही है यूजीसी को लेकर दे भर में भाजपा के ही लोग भाजपा के यूजीसी एक्ट के विरोध में इस्तीफा दे रहे है जब भाजपा के ही लोग यूजीसी एक्ट को काला कानून बता रहे है फिर भला सरकार मौन क्यो साधे हुये है इसके अलावा निर्धन सवर्ण समाज के लोगो को आरक्षण का प्रतित कम मिलने से निर्धन सवर्ण समाज के लोगो में भी नाराजगी दिखाई दे रही है इन सब के अलावा एससी-एसटी एक्ट वर्तमान में न्याय की जगह सरकार से मिलने वाली सहायता राशि वसूलने का साधन बन चुका है जिससे सवर्ण एवं पिछड़े समाज के लोग काफी पीड़ित है यदि केन्द्र एवं प्रदे की सरकार ने समय रहते इन तीनों कानूनों में बदलाव नहीं किया तो आने वाले विधानसभा एवं लोकसभा के चुनावों तक करोड़ों की संख्या में सवर्ण एवं पिछड़े वर्ग के लोग भाजपा से दूरी बना सकते है।



यूजीसी के इन विन्‍दूओं से लोग केन्‍द्र की सरकार से हो रहे है नाराज - 

चर्चा में क्यों? 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में समता के संवर्द्धन से संबंधित विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव का उन्मूलन करना है।


UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?   

जाति-आधारित भेदभाव की व्यापक व्याख्या: इन विनियमों में जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विरुद्ध किसी भी अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है। इससे OBC को स्पष्ट कानूनी सुरक्षा मिलती है और पिछले मसौदा ढाँचे में मौजूद बड़ी कमी को सुधारा गया है।

भेदभाव की विस्तारित परिभाषा: भेदभाव को किसी भी अनुचित, पक्षपाती या भिन्न व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष और यह जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान, या विकलांगता जैसे आधारों पर लागू होता है। इसमें ऐसे कृत्य भी शामिल हैं जो शिक्षा में समता को बाधित करें या मानव गरिमा का उल्लंघन करें।

अनिवार्य समान अवसर केंद्र (EOC): प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान के लिये समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा, जिसका उद्देश्य समता, सामाजिक समावेशन एवं समान पहुँच को बढ़ावा देना तथा परिसरों में भेदभाव से संबंधित शिकायतों का समाधान करना है।

प्रत्येक संस्थान को EOC के तहत एक समता समिति बनानी होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। समिति में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), दिव्यांग व्यक्ति और महिलाएँ अनिवार्य रूप से प्रतिनिधित्व करेंगी, जिससे समावेशी निर्णय-प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।

रिपोर्टिंग और अनुपालन ढाँचा: EOC को छह-मासिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जबकि संस्थानों को समानता से संबंधित उपायों पर वार्षिक रिपोर्ट UGC को सौंपनी अनिवार्य है, जिससे संस्थागत जवाबदेही सुदृढ़ होती है।

संस्थानों पर स्पष्ट ज़िम्मेदारी: इन विनियमों में भेदभाव उन्मूलन और समानता संवर्द्धन की स्पष्ट ज़िम्मेदारी संस्थानों को निर्दिष्ट की गई है तथा संस्थान के प्रमुख को प्रभावी कार्यान्वयन और अनुपालन के लिये सीधे उत्तरदायी बनाया गया है।

राष्ट्रीय स्तर का निगरानी तंत्र: UGC एक राष्ट्रीय निगरानी समिति स्थापित करेगा, जिसमें सांविधिक निकायों और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति कार्यान्वयन की निगरानी, शिकायतों की समीक्षा और निवारक उपाय सुझाने का कार्य करेगी तथा कम-से-कम वर्ष में दो बार बैठक करेगी।

अनुपालन न करने पर दंड: विनियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थान UGC योजनाओं से बहिष्कृत किये जा सकते हैं, डिग्री, डिस्टेंस या ऑनलाइन कार्यक्रम प्रदान करने पर रोक लग सकती है या उन्हें UGC मान्यता से हटाया जा सकता है। इससे ये नियम सिर्फ सलाहकार नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय बन जाते हैं।

महत्त्व

ये विनियम उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध कानूनी और संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ करते हैं तथा वर्ष 2019 के IIT दिल्ली अध्ययन में उठाई गई गंभीर चिंता को संबोधित करते हैं, जिसमें पाया गया कि ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों के 75% छात्र परिसर में भेदभाव का सामना करते हैं।

OBC को शामिल करना सामाजिक न्याय के लिये एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

सख्त दंड यह संकेत देते हैं कि अब ये नियम केवल सलाहकारी दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय विनियम हैं।

UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)

भारत में राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने का पहला प्रयास वर्ष 1944 के सार्जेंट रिपोर्ट से शुरू हुआ, जिसमें एक विश्वविद्यालय अनुदान समिति गठित करने की सिफारिश की गई थी।

वर्ष 1945 में गठित इस समिति ने आरंभ में अलीगढ़, बनारस और दिल्ली विश्वविद्यालयों का पर्यवेक्षण किया। वर्ष 1947 तक इसके दायरे में सभी मौज़ूदा विश्वविद्यालय शामिल हो गए।

वर्ष 1948 में डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने इसे UK मॉडल के अनुरूप पुनर्गठित करने की सिफारिश की।

वर्ष 1952 में केंद्र सरकार ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिये अनुदान की देखरेख हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को नामित किया।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा 1953 में औपचारिक रूप से उद्घाटन किये जाने के बाद यह वर्ष 1956 में एक वैधानिक निकाय बन गया।

UGC का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है, जिसमें एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त दस अन्य सदस्य होते हैं।

इसके प्रमुख कार्यों में विश्वविद्यालयों को अनुदान आवंटित करना, उच्च शिक्षा सुधारों पर सलाह देना और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता व मानकों को बढ़ावा देना शामिल हैं।

भारत में जाति-आधारित भेदभाव शिक्षा तक पहुँच को कैसे प्रभावित करता है?

संवैधानिक मूल्यों को खतरा: जाति-आधारित भेदभाव संविधान में निहित समता, गरिमा और बंधुत्व के सिद्धांतों को कमज़ोर करता है। 

यह सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थानों में सार्वजनिक विश्वास को कम करता है तथा समावेशी और न्यायसंगत विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के विपरीत है।

गुणवत्तापूर्ण संस्थानों में सीमित प्रवेश: जाति आधारित भेदभाव न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को भी मज़बूत करता है; परिणामस्वरूप, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों का प्रतिनिधित्व उच्च स्तरीय स्कूलों और कॉलेजों में सीमित रह जाता है।

शिक्षा तक सीमित पहुँच समुदायों को निम्न-आय वाले व्यवसायों में फँसा देती है, जिससे शिक्षा की सामाजिक समता भूमिका कमज़ोर होती है।

मनोवैज्ञानिक बहिष्कार: “आरक्षित वर्ग” की पहचान से जुड़ा मनोवैज्ञानिक बहिष्कार और सामाजिक कलंक विद्यार्थियों में चिंता, आत्मसम्मान की कमी और कमज़ोर शैक्षणिक प्रदर्शन का कारण बनता है।

थोरात समिति (2007) ने छात्रावासों, भोजनालयों और खेलों में भिन्नता पर प्रकाश डाला, जो उपेक्षित समुदाय के छात्रों को पृथक् करता है और आभिजात्य वर्ग के भीतर "घेट्टो" (ऐकांतिक क्षेत्र) का निर्माण करता है।

शिकायत निवारण की विफलता: कई विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति/जनजाति सेल प्रायः निष्क्रिय या "लीगल टीथ" (प्रभावी अधिकार) नहीं होते हैं। वे प्रायः पीड़ित को न्याय दिलाने की बजाय संस्था की प्रतिष्ठा की रक्षा को प्राथमिकता देते हैं। 

थोराट समिति (2007) ने पाया कि अनुसूचित जाति/जनजाति सेल दस्तावेज़ों पर मौज़ूद हैं, वे प्रायः स्वायत्तता का अभाव रखते हैं।

हाई ड्रॉपआउट रेट: जातिगत भेदभाव वित्तीय, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबावों के साथ मिलकर उपेक्षित समूहों में अनुपात से अधिक हाई ड्रॉपआउट का कारण बनता है।

शिक्षा में जातिगत भेदभाव के समाधान हेतु भारत की पहलें

संवैधानिक एवं विधिक सुरक्षा अवरोध:

अनुच्छेद 15: राज्य को शैक्षणिक संस्थानों (निजी संस्थानों सहित, 93वें संशोधन द्वारा जोड़े गए) में प्रवेश के लिये अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु "विशेष उपबंध" (आरक्षण) करने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 46:इसके अंतर्गत राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व में प्रावधान है कि वह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रत्येक प्रकार के सामाजिक अन्याय और शोषण से संरक्षित रखे और यही प्रावधान भेदभाव विरोधी कानूनों की प्रमुख आधारशिला के रूप में कार्य करता है।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश को रोकने या सार्वजनिक रूप से अनुसूचित जाति/जनजाति सदस्य का अपमान करने जैसी कार्रवाइयों को अपराध बनाता है।

वित्तीय एवं शैक्षणिक पहुँच संबंधी पहल:

श्रेष्ठ (SHRESHTA): मेधावी अनुसूचित जाति के छात्रों को प्रतिष्ठित निजी स्कूलों में आवासीय शिक्षा प्रदान करता है, जिससे सरकारी स्कूली शिक्षा की 'गेटोइज़ेशन' को तोड़ने और अभिजात शिक्षा तक पहुँच बेहतर करने में मदद मिलती है।

अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु राष्ट्रीय फेलोशिप: एम.फिल. और पीएच.डी. के अनुसूचित जाति/जनजाति शोधार्थियों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिससे संकाय अनुदान पर निर्भरता कम होती है और शैक्षणिक स्वायत्तता बेहतर होती है।

टॉप क्लास एजुकेशन स्कीम: IIT और IIM जैसे प्रमुख संस्थानों में अनुसूचित जाति/जनजाति छात्रों की पूरी फंडिंग करती है, जिससे अभिजात उच्च शिक्षा की वित्तीय बाधाएँ दूर होती हैं।

पीएम-अजय (PM-AJAY): अनुसूचित जाति के छात्रों के लिये छात्रावास निर्माण पर केंद्रित है, जिससे सुरक्षा सुनिश्चित होती है, सामाजिक अलगाव कम होता है और उच्च शिक्षा में प्रवेश दर बेहतर होती है।

शैक्षिक संस्थानों में सांस्थानिक जातिवाद को समाप्त करने हेतु आवश्यक उपाय इस प्रकार हैं:

सामाजिक ऑडिट: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) को केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 'शून्य भेदभाव' अनुपालन का वार्षिक सामाजिक ऑडिट करना चाहिये।

समावेशन पाठ्यक्रम: पाठ्यक्रम को उपनिवेशवाद मुक्त करें ताकि दलित इतिहास और साहित्य को सभी विषयों में शामिल किया जा सके। उनके इतिहास का बौद्धिक रूप से प्रतिनिधित्व होना हाशिये  पर रहने वाले छात्रों की प्रतिष्ठित स्थानों में उपस्थिति को मान्यता देता है।

मेंटरशिप सर्कल: नए छात्रों के लिये सांस्कृतिक और सामाजिक अंतर को कम करने के उद्देश्य से मेंटरशिप कार्यक्रमों (जैसे– कुछ IITs में साथी पहल) को संस्थागत रूप से लागू करना।

फैकल्टी संवेदनशीलता: फैकल्टी और स्टाफ के लिये अनिवार्य "अनलर्निंग कास्ट" कार्यशालाएँ। प्रोफेसरों को ऐसे "सूक्ष्म उत्पीड़न" (जैसे– रैंक सार्वजनिक रूप से पूछना, लैब समूहों को अलग करना) की पहचान करने के लिये प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, जो प्रतिकूल वातावरण बनाने में योगदान करते हैं।

विशेष भर्ती अभियान (SRD): अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति फैकल्टी पदों में भारी रिक्तियों (अक्सर IITs में 30-40%) को तात्कालिक रूप से भरा जाना चाहिये। विविध फैकल्टी संरचना भेदभाव के खिलाफ सबसे मज़बूत रोक है।


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