रायपुर- देशभर में साइबर ठगों ने नाक में दम कर रखा है। बड़े शहरों में फोन के जरिए अरबों रुपये की कमाई कर रहे हैं। बात अगर रायपुर की जाए तो यहां भी ठग जाल बुन रहे हैं, लेकिन उनके मंसूबों पर एक महिला कांस्टेबल की मेहनत की वजह से पानी फिर रहा है। क्राइम ब्रांच यूनिट की कांस्टेबल बबीता देवांगन की तरकीब ठगों को मात दे रही है। नतीजा यह है कि जिले में 80 से ज्यादा लोग ठगी के शिकार होते बचे। ऑनलाइन फोन पर गुमराह कर ठगों ने पीड़ितों को झांसे में लेकर बैंक खाते से रकम तो उड़ाई, लेकिन जैसे ही कांस्टेबल के पास सूचनाएं पहुंचीं, बहुत की कम से कम समय में ई-वॉलेट से जुड़े नोडल अफसरों को कांस्टेबल बबीता ने फोन कर ट्रांजेक्शन रुकवा दिया। 2015 में क्राइम यूनिट में शामिल हुई बबीता ने एक-एक प्रकरण में लाखों रुपये तक ट्रांसफर होने से बचा लिए।कांस्टेबल का कहना है कि अगर उनसे कोई भी पीड़ित संपर्क करता है तो वह ऑफिस में न रहकर भी बखूबी इंटरनेट और सोशल नेटवर्क के जरिए नोडल अफसरों से संपर्क साधती हैं, मैसेज फारवर्ड करते ही ट्रांजेक्शन रुक जाता है। दो सालों में वह 100 से ज्यादा प्रकरणों में जांच का हिस्सा बन चुकी हैं। लिहाजा किस तरह के ट्रांजेक्शन को किस टाइम पर रोका जाए, अच्छा अनुभव हो चुका है। जिस तरह से रायपुर जिले में हाईटेक ठगों का हमला है, उस हिसाब से छह माह के भीतर 100 प्रकरणों में ई-वॉलेट का ट्रांजेक्शन रुकवाने में सफलता मिली। विभाग में आला अफसर भी कई बार ऐसी कामयाबी में सम्मान कर चुके हैं। हाइटेक ठगी से बचने वालों में कारोबारी, गृहणियां और सरकारी विभागों में पदस्थ अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं।दो साल के अंदर साइबर ठगी के इस तरह के मामलों में जांच करते हुए कांस्टेबल बबीता 22 तरीकों की ठगी से वाकिफ है। साइबर सेल के आंकड़ों पर गौर करें तो हर साल पांच सौ से ज्यादा साइबर क्राइम के केस सामने आ रहे हैं, जिसमें ज्यादा आर्थिक अपराध के प्रकरण शामिल हैं। साइबर यूनिट के साथ काम करते हुए हाइटेक ठगी में अब बेहतर स्टडी है।कांस्टेबल बबीता का कहना है कि पुलिस लाइन से क्राइम यूनिट में शामिल होने के बाद इस तरह की जवाबदारी मिलने की जरा भी उम्मीद नहीं थी। स्मार्ट फोन और इंटरनेट के हाइटेक फीचर्स के बीच ठगों का तोड़ निकालने चुनौती थी, लेकिन जब वह फोन कॉल्स और वॉलेट ट्रांजेक्शन का डाटा खंगालने में जुटी तो सफलता मिलती गई। आज कोई भी व्यक्ति बैंक खाते से रकम निकलने मैसेज की जानकारी दे तो तुरंत ट्रांजेक्शन रुकवाया जा सकता है।फोन के जरिए अगर ठगी हुई है और जरा सी देरी हुई मतलब नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांस्टेबल बताती हैं कि ई-वॉलेट से ट्रांजेक्शन करने वाली कंपनियां पासवर्ड या ओटीपी जनरेट होते ही रुपये दूसरी जगह ट्रांसफर कर देते हैं। अगर पीड़ित के खाते से रकम निकला भी तो चंद मिनट रहते हैं। इसी वक्त वालेट पर सक्रियता जरूरी है। वरना नुकसान से बच पाना मुश्किल हो जाता है, ठग रुपयों का इस्तेमाल ऑनलाइन खरीदी में कर ही लेते हैं।
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नई दिल्ली