
स्वतंत्रता दिवस पर देशवासी आजादी के 72 साल पूरे होने का जश्न मना रहे थे और आजादी की लड़ाई में अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले वीरों की कुर्बानी याद कर रहे थे. उधर, मध्य प्रदेश के एक गांव के युवाओं ने आजाद भारत में सरहद की सुरक्षा करते हुए शहादत देने वाले एक जवान के परिवार को अनोखा उपहार दिया. इंदौर जिले के बेटमा गांव में युवाओं ने झोपड़ी में रहने को मजबूर शहीद के परिवार को नया मकान गिफ्ट किया.
समाचार एजेंसी एएनआई की खबर के अनुसार युवाओं ने स्वतंत्रता दिवस के दिन शहीद मोहन सिंह के परिवार को मकान की चाबी सौंप दी. शहीद की पत्नी के मकान में प्रवेश करते समय युवाओं ने सम्मान में अपनी हथेलियां बिछा दीं.
युवाओं की इस पहल को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सराहा है. राह में बिछी हथेलियों के बीच से मकान में प्रवेश करती शहीद की पत्नी के वीडियो को रिट्वीट करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने लिखा कि युवाओं ने शहीद के परिवार की मदद कर देशभक्ति की मिसाल कायम की है.
इंदौर के बेटमा गाँव के युवाओं ने शहीद के परिवार की मदद कर देशभक्ति की मिसाल कायम की है!आप जैसे युवा ही भारत की असली पहचान हैं!आप सभी ने सच्चे अर्थों में साबित किया है कि देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले का परिवार उसके जाने के बाद देश का परिवार बन जाता है! https://t.co/kwRgJF1KLs— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) August 16, 2019
टूटी झोपड़ी में रह रहे शहीद के परिवार को मकान उपलब्ध कराने के लिए जब सरकार के स्तर से कोई पहल नहीं हुई, तब गांव के युवाओं ने यह बीड़ा उठा लिया. युवाओं ने शहीद के परिजनों को पक्का मकान उपलब्ध कराने के लिए 'एक चेक, एक हस्ताक्षर' अभियान शुरू किया. अभियान से जुड़े युवा विशाल राठी ने कहा कि इसके द्वारा 11 लाख रुपये चंदा एकत्रित हुआ.
उन्होंने कहा कि मकान के निर्माण पर 10 लाख की लागत आई. शेष बचे एक लाख रुपये से शहीद मोहन सिंह की प्रतिमा का निर्माण कराया जाएगा. विशाल ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के अवसर पर हमने मकान की चाबी शहीद की पत्नी को सौंप दी. उन्होंने हमें राखी भी बांधी.
1992 में शहीद हुए थे मोहन
बताया जाता है कि मोहन सिंह सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में तैनात थे. वह 1992 में सरहद की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे. उस समय उनका तीन साल का बेटा था और पत्नी गर्भवती भी थीं. मोहन की शहादत को 26 वर्ष से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी सरकार ने परिवार की सुधि नहीं ली.
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