दर्जनभर हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों के साथ फांसी कोठी से शुरू होता है कैदी का आखरी सफर

सजा से पहले कैदी को फांसी कोठी में रखा जाता है (फोटो- Getty)
निर्भया कांड के दोषियों को सजा-ए-मौत कब मिलेगी, इस बात का फैसला अदालत को करना है. लेकिन उन्हें फांसी पर लटकाने के लिए तिहाड़ जेल प्रशासन ने कमर कस ली है. अब जैसे ही अदालत चारों दोषियों के खिलाफ फार्म नंबर 42 यानी ब्लैक वारंट जारी करेगी, वैसे ही उन्हें फांसी दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाए जाने से पहले के दिनों में फांसी कोठी में रखा जाता है. फिर वहीं से सजायाफ्ता मुजरिम अपना आखरी सफर पूरा करता है.
मुजरिम का आखरी सफर
जब अदालत किसी मुजरिम के खिलाफ मौत का फरमान यानी ब्लैक वारंट जारी करती है, तो उस पर कैदी को सजा-ए-मौत देने का वक्त भी लिखा होता है. जिस दिन कैदी को फांसी दी जानी होती है, उस दिन उसे पहनने के लिए नए कपड़े दिए जाते हैं. नहाने के लिए पूछा जाता है. चाय भी पूछी जाती है. फिर ब्लैक वारंट पर लिखे वक्त के हिसाब से ही उस कैदी को फांसी कोठी से बाहर निकाला जाता है.
सुरक्षाकर्मियों के घेरे में होता है कैदी
बाहर निकालने के बाद उसके चेहरे को काले कपड़े से ढ़क दिया जाता है. ताकि वहां आस-पास क्या हो रहा है वो देख ना सके. उसे लेने के लिए 12 हथियारबंद सुरक्षाकर्मी आते हैं. वो उसे चारों और से घेर कर चलते हैं. कई बार तो मौत के डर से कैदी के पैर तक कांपने लगते हैं. तब सुरक्षाकर्मी या जेलकर्मी सजा पाने वाले कैदी को बाकायदा कंधे पर उठा कर फांसी के तख्ते तक ले जाते हैं. और वहां फांसी की कार्रवाई पूरी की जाती है.

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