महिलाओं का खतना: …ताकि उन्हें यौन उत्तेजना न हो और वे ‘पाक-साफ’ रहें

 महिलाओं का खतना: …ताकि उन्हें यौन उत्तेजना न हो और वे ‘पाक-साफ’ रहें

'खतना' इस शब्द से तो आप वाकिफ़ होंगे. इस्लाम में खतना को सुन्नत माना जाता है और हर मुस्लिम पुरुष को शिशु अवस्था में इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. लेकिन क्या आपको महिलाओं के खतना के बारे में जानकारी है. शायद नहीं. महिलाओं का खतना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके बारे में जानकर आपकी रुह कांप उठेगी. भारत में भी ये प्रथा पिछले कई सालों से लगातार जारी है. मुस्लिमों के बोहरा समाज में आज भी ये प्रथा प्रचलित है.

यूएन इसे 'मानवाधिकारों का उल्लंघन' मानता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2012 में एक प्रस्ताव पारित कर इसे दुनिया भर से ख़त्म करने का संकल्प लिया गया था. लेकिन इसके बावजूद दुनिया के कई देशों में मजहब के नाम पर ये ख़ौफनाक परंपरा जारी है. यूनिसेफ द्वारा 2016 में जारी किए एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में करीब करोड़ महिलाएं हैं जिनका खतना हो चुका है.

क्या है महिला खतना-

इसे  'फ़ीमेल जेनाइटल म्युटिलेशन' (एफ़जीएम) भी कहते हैं. जिस प्रकार से पुरुषों के खतना में शिश्न के अग्र भाग की त्वचा को आंशिक रूप से हटा दिया जाता है, उसी प्रकार महिलाओं के खतना में उनकी योनि के  बाहरी हिस्से को काट दिया जाता है. ये प्रक्रिया बहुत ही पीड़ादायक होती है और इसे किए जाने का कोई भी वैज्ञानिक आधार/कारण नहीं है. प्रक्रिया के दौरान कभी अत्याधिक रक्त स्त्राव या संक्रमण के चलते लड़की की हालत गंभीर हो जाती है. खतने के काफी समय बाद भी कई महिलाएं अपने ब्लैडर को खाली करने में परेशानी महसूस करती हैं. महावारी में उनका खून ठीक से नहीं बहता है. कुछ के लिए सेक्स करना नामुमकिन हो जाता है. कई महिलाओं के दो शारिरिक अंग मतलब योनि और मलद्वार आपस में जुड़ सकते हैं. इससे बचने के लिए उन्हें अपनी योनि में स्टूल लगवाना होता है. इसके साथ जीना बेहद ही मुश्किल होता है.

ये घृणित प्रथा भारत में भी बदस्तूर जारी है. आपके या हमारे आसपास ही ऐसी कई महिलाएं हो सकती हैं जिन्हें धर्म के नाम पर इस असहनीय दर्द से गुजरना पड़ा होगा. भारत में रहने वाले बोहरा समाज के मुसलमानों में आज भी ये परंपरा कायम है. खास बात ये है कि बोहरा मुस्लिम समुदाय देश के काफी संपंन और शिक्षित समुदायों में शुमार किया जाता है. लेकिन इतना पढ़ा-लिखा होने के बावजूद इस रुढ़िवादी और घिनौनी प्रथा इस समाज में कायम है.

मासूम लड़कियों का खतना उनके बचपन यानि की 6-7 साल की उम्र में ही करवा दिया जाता है. इस प्रक्रिया को करने से पहले बच्चियों को एनिस्थिशिया भी नहीं दिया जाता, लिहाजा बच्चियां पूरे होश में रहती हैं और दर्द से चीखने चिल्लाने के अलावा कुछ नहीं कर पातीं. दर्द की कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती, हर बार मूत्र विसर्जन करने, उठने बैठने में भी मासूम बच्चियों को नरक जैसी पीड़ा भोगनी पड़ती है. खतना के बाद भी महिलाओं के अंडाशय में गांठ, पेशाब करने में दर्द और बाद में संक्रमण, जन्म के दौरान ही शिशुओं की मृत्यु, बांझपन, पीरियड्स में समस्या, योनी में सूजन, दर्द और खुजली की समस्या रहती है. 

क्यों किया जाता है मासूम बच्चियों का खतना-

आप सोच रहे होंगे की ये प्रक्रिया यदि इतनी दर्दनाक और क्रूर है तो आखिकर लोग इस अपनी ही बहन-बेटियों पर क्यों लागू करते हैं. इसका जवाब है मजहबी कट्टरता और महिलाओं को दोयम दर्जे का समझे जाने की विकृत मानसिकता. ये प्रथा जितनी घृणित है, उससे भी ज्यादा घृणित इस प्रक्रिया को अपनाने की वजह है. महिलाओं की योनि के बाहरी हिस्से को ‘क्लिटरिस’ कहा जाता है. इस ‘क्लिटरिस’ को इस समाज में 'हराम की बोटी' का नाम दिया गया है. माना जाता है कि इसके कारण महिलाओं में यौन उत्तेजना जागृत होती है. मासूम बच्चियों की क्लिटरिस जिसे ये हराम की बोटी कहते हैं उसे इसलिए काट दिया जाता है कि इससे उन्हें यौन उत्तेजना न हो और वे अपने निकाह तक पाक-साफ/ वर्जिन/ कुंवारी रहें. स्पष्ट है कि इस घृणित प्रथा के पीछे महिलाओं को सेक्स टॉय समझने की गंदी सोच है.

आखिर क्यों बंद नहीं हो पा रही है ये बेहूदा मजहबी परंपरा-

ऐसा नहीं है कि इस क्रूर परंपरा के खिलाफ किसी ने आवाज नहीं उठाई. समय-समय पर पीड़ित महिलाओं से लेकर समाजिक विभिन्न समाजिक संगठनों ने सरकार और अदालतों के सामने इस मुद्दे को उठाया है. करीब दो साल पहले कोर्ट ने दाउदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना को भारतीय दंड संहिता और बाल यौन अपराध सुरक्षा कानून (पोक्सो एक्ट) के तहत अपराध करार दिया है. 

दाउदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिलाओं के खतना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं का खतना यानी महिला जननांग का छेदन करने की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है, जो कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा और धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करने की गारंटी देता है। खतना प्रथा के समर्थन में खड़े संगठन की ओर से पेश हुए वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि खतना करना इतना क्रूर भी नहीं है, जितना कि इसे बताया जा रहा है। तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की संयुक्त पीठ ने कहा था, “यह संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन है क्योंकि इसमें बच्ची का खतना कर उसको आघात पहुँचाया जाता है।” केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि सरकार याचिकाकर्ता की दलील का समर्थन करती है कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) और बाल यौन अपराध सुरक्षा कानून (POCSO Act) के तहत दंडनीय अपराध है। लेकिन हमारे यहां महज कानून बनाकर समस्या हल कहां होती है. खासकर तब जब अपराध मजहब से जुड़ा हो. लिहाजा आज भी ये प्रथा लगभग उसी तरह से जारी है.

भारत के अलावा दुनिया के दूसरे देशों में भी महिला खतना की परंपरा है. इंडोनेशिया, ईराक, यमन, कुर्दिस्तान, सोमालिया, गिनी जैसे देशों में ये परंपरा काफी ज्यादा है. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, बेल्जियम, यूके, अमरीका, स्वीडन, डेनमार्क और स्पेन जैसे कई देश इसे पहले ही अपराध घोषित कर चुके हैं. 

लेकिन केवल कानून इस परंपरा को रोकने में कामयाब नहीं है. इसे समझने के लिए जर्मनी का उदाहरण दिया जा सकता है. जर्मनी एक विकसित देश है और यहां का समाज भी काफी खुले विचारों वाला माना जाता है. इसके बावजूद 2017 के बाद यहां महिला खतना के मामले 44 फीसदी बढ़े है. जर्मनी की सरकार का मानना है कि जिन देशों में महिला खतना की परंपरा है वहां से बहुत से लोग जर्मनी में आ गए हैं. यही देश में महिला खतना के मामले बढ़ने की वजह है.

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने

संपर्क फ़ॉर्म