भावी पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य के लिए पर्यावरण में निवेश जरूरी

कोलारस- मानव और पर्यावरण के बीच अटूट संबंध है ! प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं !  किंतु,भौतिक विकास की अंधी दौड़ और आधुनिक जीवन शैली  ने आज हमारी धरती और उसपर मौजूद  जीवन के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है ! कोलारस नगर के पर्यावरण प्रेमी पेशे से शिक्षक  व आलोक संघ  कोलारस-बदरवास ब्लॉक अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह लोधी ने बताया कि हमारी भावी पीढ़ी के अस्तित्व की रक्षा के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखना जरूरी है ! इसी को ध्यान में रखकर दुनिया भर में  5 जून  को पर्यावरण दिवस  के रूप में मनाया जाता है ! इसबार विश्व पर्यावरण दिवस 2022 की थीम है - 'Only One Earth' (केवल एक पृथ्वी ) है ! संदेश स्पष्ट है कि हमारे पास रहने के लिए, अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 'बस यही एक पृथ्वी है' ! प्रकृति के साथ सद्भाव के साथ रहने पर ध्यान केंद्रित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है !  यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि विश्व में 'सतत् विकास' की अवधारणा का विकास  ब्रंटलैण्ड आयोग (1983-1987 ) की रिपोर्ट से  भले ही माना जाता हो ; लेकिन ,पर्यावरण संरक्षण और सतत् विकास जैसे पर्यावरणीय आदर्श सदियों पहले से हमारे धर्म व संस्कृति और जीवन पद्धति का अभिन्न अंग रहे हैं ! हमारे वेद,पुराण और धर्म शास्त्र पर्यावरणीय मूल्यों से भरे पड़े हैं ! अथर्ववेद के भूमिसूक्त में कहा गया है- हे भूमि ! तेरे वन मेरे लिए सुखदायी हों ! मैं तेरे वृक्षों को इस तरह काटूँ कि वे शीघ्र ही अंकुरित हो जाएं....!  संपूर्ण रूप में काटकर तेरे मर्म स्थल पर प्रहार न करूं !" संदेश है कि हम प्रकृति का दोहन इसप्रकार करें कि प्राकृतिक संसाधन आने वाली पीढ़ी के लिए भी सुरक्षित रहें ! इससे बढ़कर 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट' का भला कौन सा आदर्श हो सकता है ! प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता देखिए ; कालिदास कृत 'अभिज्ञान शाकुंतलम्'  में उल्लेख है -"न दत्ते प्रिय मण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् !" इससे आशय है कि शकुंतला फूलों से इतना प्रेम करती थी ,कि वह अपने श्रृंगार तक के लिए फूलों और पत्तियों को नहीं तोड़ती थी !  प्रकृति से प्रेम  व उसके संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता के ये आदर्श हमारे धर्म और संस्कृति की धरोहर रहे हैं ! हमारे धर्म, संस्कृति व नैतिकता का  क्षितिज पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी तक विस्तृत  है! किंतु लालच में अंधे होकर हम "माँ" के समान जीवनदायिनी प्रकृति को सोने से अंडे देने वाली मुर्गी भर समझ  बैठे हैं ! वन,रेत ,पहाड़, नदियां अब भी पूजनीय हों,किंतु .....बड़े लोगों के धंधे का जरिया बन गए हैं ये संसाधन ! धरती माँ का श्रृंगार लूटा जा रहा है ,नदियों का सीना सीना चीरा जा रहा है ....!  हम भूल गए कि हमारा खानपान, हमारी साँसें .....हमारी भावी पीढ़ी का अस्तित्व इसी 'पृथ्वी' और उसके 'पर्यावरण' पर निर्भर हैं !  कोरोना त्रासदी के दौरान प्रकृति ने विज्ञान को उसकी हद दिखा दी ! अब भी हम सँभल जाएँ ....."प्रकृति" की भी सुनें ! अन्यथा परिणाम के लिए तैयार रहें ! आज ग्लोबल वार्मिंग के चलते संपूर्ण विश्व का अस्तित्व खतरे में है ! जिस धरा पर हम रहते हैं... जिस हवा में  हम साँस लेते हैं... जिस जल की वजह से हमारा अस्तित्व है, प्रदूषित हो चुके हैं ! क्या इनकी  रक्षा करना हमारा दायित्व नहीं है? क्या यह केवल सरकारों का दायित्व है ? नहीं....! हमें इस धरती और उसके पर्यावरण के प्रति अपने नैतिक दायित्व को  समझना होगा ! इसके लिए  हम "पर्यावरणीय नैतिकता" को जीवन पद्धति का अंग बनाएँ ; वृक्षारोपण को अपना शौक बनाया जाए;कृषि और उद्योगों में पर्यावरण हितैषी पद्धतियों व तकनीकों का प्रयोग करें और सरकारों, सरकारी तंत्र को भी नीति निर्माण और क्रियान्वयन के स्तर पर सचेत बनाए रखने के लिए दबाव बनाते रहें ! यहाँ महात्मा गांधी के कथन की चर्चा समीचीन है -"प्रकृति हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है,लालच की नहीं!" हमें मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति व जीवन के अस्तित्व की रक्षा के लिए प्रकृति को सहेजना होगा !

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