मनुष्य को प्रारब्ध का फल भोगना बड़ाता है, ईश्वर की भक्ति से उसे बदला जा सकता है

एक सड़क पर बड़ी तेज धूप थी | उस पर एक बैलगाड़ी अपनी मन्द गति से चली जा रही थी | गाड़ी पर बहुत सा बोझा लदा हुआ था गाड़ीवान भी मस्त गाड़ी पर छाया करके आराम कर रहा था | सुनसान सड़क पर कहीं से एक कुत्ता आ गया |वह भी उसी ओर जा रहा था जिधर को गाड़ी जा रही थी | कुत्ते को जब तेज धूप लगने लगी तो सोचा कि कैसे धूप की गर्मी से बचा जाय | तो कुत्ते ने सोचा कि इसी बैलगाड़ी के नीचे हो जांय तो धूप न लगेगी |

      कुत्ता बैलगाड़ी के नीचे हो गया | अब बैलगाड़ी अपनी गति से जा रही थी | कुत्ता भी उसी गति से गाड़ी के नीचे नीचे उसकी छाया में जा रहा था | कुछ देर तक इसी प्रकार चलते चलते कुत्ते को लगने लगा कि वह खुद पूरी बैलगाड़ी को अपने ऊपर लिए हुए है | वह खुद पूरा बोझ उठाये हुये है | वह खुद सारे बोझ के साथ चल रहा है वह खुद बोझ से दबा जा रहा है |

      जब इस प्रकार की भावना के वशीभूत कुत्ता चल रहा था तभी वह बैल के पैरों के निकट पहुँच गया | बैल ने जो एक लात मरी तो कुत्ता छटक कर दूर जा गिरा | पें पें चिल्लाने लगा | तब उसने देखा कि गाड़ी तो अब भी चली जा रही है | तब उसके समझ में आया कि इस गाड़ी को चलाने वाला कोई और है | गाड़ी को खींचने वाला कोई और है | वह स्वयं जा रही है | उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है | अगर मैं चुपचाप उसकी छाया में चलता जाता तो ये बैल भी मुझे न मारते और धूप भी रस्ते में न लगती |

      इसी प्रकार, संसार को बैलगाड़ी अपनी गति से चली जा रही है | इसे चलाने वाला कोई और है | बोझ भी किसी दूसरे को खींचना है | हमें तो गाड़ी के नीचे छाया में हर कष्ट से बचते हुये चलते रहना चाहिये | वह प्रारब्ध इन सबके लिए उत्तरदायी है | हम नाहक अपने को कर्ता-धर्ता समझ रहे हैं | काल जब लात मार कर हमें चेताता है तब हम सत्यता को समझ पाते हैं |

      वास्तव में इस संसार में निस्पृह बन कर रहना चाहिए प्रारब्ध स्वयं सब करता रहता है |


जय श्री राधे 


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