प्रभु संकीर्तन - सत्संग अर्थात सत्य के संग,सुविचार के संग। हमे प्रतिदिन सत्संग में सम्मिलित होना चाहिए, भले ही वो पुस्तको के माध्यम से, फेसबुक के माध्यम से अथवा प्रत्यक्ष किसी सन्त के माध्यम से। ऐसा करने से हमारे विचार सदैव सत्य की ओर प्रेरित होते हैं, और फिर प्रतिदिन करने से यह हमारी भूख बन जाती है।और इस भूख को शांत करने के लिए सत्संग का मार्ग चुनना पड़ता हैं।सत्संग से हम पमात्मा की ओर अग्रसर होते हैं,सकारात्मक बातों से प्रेरित होते है,जीवन में शांत रहना सीखते है।।इसे समझने के लिए आप ये कथा पढ़े।
एक बार एक युवक संत के पास आया और कहने लगा , ‘'गुरू महाराज ! मैंने अपनी शिक्षा से पर्याप्त ज्ञान ग्रहण कर लिया है । मैं विवेकशील हूं और अपना अच्छा-बुरा भली-भांति समझता हूं , किंतु फिर भी मेरे माता-पिता मुझे निरंतर सत्संग की सलाह देते रहते हैं । जब मैं इतना ज्ञानवान और विवेकयुक्त हूं, तो मुझे रोज सत्संग की क्या जरूरत है ?'’ संत ने उसके प्रश्न का मौखिक उत्तर न देते हुए एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर मार दी ।और युवक को अगले दिन आने को कहा, युवक अनमने भाव से वापस चला गया ।
अगले दिन वह फिर संत के पास आया और बोला, " मैंने आपसे कल एक प्रश्न पूछा था, किंतु आपने उत्तर नहीं दिया । क्या आज आप उत्तर देंगे ?" संत ने पुन: खूंटे के ऊपर हथौड़ी मार दी। किंतु बोले कुछ नहीं । युवक ने सोचा कि संत हैं, शायद आज भी मौन में हैं ।
वह तीसरे दिन फिर आया और अपना प्रश्न दोहराया । संत ने फिर से खूंटे पर हथौड़ी चलाई । अब युवक परेशान होकर बोला, ‘'आखिर आप मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं ? मैं तीन दिन से आपसे प्रश्न पूछ रहा हूं ।’' तब संत बोले ‘'मैं तो तुम्हें रोज जवाब दे रहा हूं । मैं इस खूंटे पर हर दिन हथौड़ी मारकर जमीन में इसकी पकड़ को मजबूत कर रहा हूं । यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो इससे बंधे पशुओं द्वारा खींचतान से या किसी की ठोकर लगने से अथवा जमीन में थोड़ी सी हलचल होने पर यह निकल जाएगा । यही काम सत्संग हमारे लिए करता है । वह हमारे मनरूपी खूंटे पर निरंतर प्रहार करता है, ताकि हमारी पवित्र भावनाएं दृढ़ रहें । युवक को संत ने सही दिशा-बोध करा दिया। सत्संग हर रोज नित्यप्रति हृदय में सत् को दृढ़ कर असत् को मिटाता है,"
*इसलिए सत्संग हमारी जीवन चर्या का अनिवार्य अंग होना चाहिए.....जय जय श्री राधेकृष्ण जी।श्री हरि आपका कल्याण करें।
