सभी जीवित प्राणी जन्म, मृत्यु और पुर्नजन्म के चक्र का हिस्सा - मुनि श्री मंगलसागर - Kolaras


मनुष्य अकाल मरण के अनेक कारण :- मुनि श्री मंगल नंदसागर                        

कोलारस - चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर पर मुनि श्री मंगल नंदसागर महाराज ने भक्तों के प्रश्नों के उत्तर और प्रवचनों में कहाँ मनुष्य को अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, स्वार्थ, मित्रद्रोह, पिछले जन्मों के अनैतिक कर्म, दुराचार जैसे अनेक कारण है जिससे मनुष्य की अकाल मरण का कारण बनते है मुनि श्री ने कहाँ अकालमरण का अर्थ किसी व्यक्ति की मृत्यु का उसके निर्धारित जीवनकाल से पहले होना है जीवन मृत्यु कर्मा से निर्धारित है। 

आत्मा अजर अमर और मरण केवल शरीर का होता है यही सृष्टि का नियम है मृत्यु एक निश्चित प्रक्रिया है जो आत्मा के कर्मो पर निर्भर करती है दूसरा अत्यन्त अभिवान एक मान रूपी अग्नि है जिसे उत्तम मार्दव धर्म रूपीजल से बुझाना चाहिए यह अहंकार गर्व और घमंड को दर्शाता है जो व्यक्ति को आत्म नियंत्रण से दूर ले जाता है और क्षण भंगुर संपंक्तियों पर घमंड कराने के लिए प्रेरित करता है यह अहंकार कर्मो की आत्मा को ढंक देता है मुनि श्री ने कहाँ अधिक बोलने से नकारात्मक प्रभाव पड़ते है जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों के लिए हनिकारक है अधिक बोलने का आश्य है किसी को अशब्द बोल चोट पहुंचना' इस प्रकार का कार्य कर्म आत्मा की शुद्धता को दूषित करता है जो मोक्ष के मार्ग मे बाधा डालता है। 

अहिंसा केवल शारीरिक क्रियाओं तक सीमित नहीं बल्कि वाणी और मन की अहिंसा भी शामिल है जो लोग दूसरों की निंदा कर भावनात्मक पीड़ा पहुंचाते है एवं साथ में अधिक बोलने पर मानसिक ऊर्जा का भी ह्रास होता है जो  व्यक्ति कम बोलता है उसकी वातों का महत्व रहता है यदि अपने बोलने से किसी को पीड़ा होती है तो ऐसी स्थिति में मनुष्य को चुप रहना ही बेहतर है त्याग के अभाव का प्रभाव में व्यक्ति मोह आसक्ति और कर्मो के बंथन से वं धा रहता है।

जिससे वह आध्यात्मिक प्रगति और मुक्ति से दूर हो जाता जो मनुष्य लालच में फंसा रहा होता है वह जो दुख और संसार चक्र का कारण बनता है चूकि क्रोध आत्मा का स्वाभाविक गुण है जो कर्मो से उत्पन्य होता है जो कर्म वंधन का कारण बनता है क्योंकि विवेक को क्रोध नष्ट्र कर देता है जो जीव को जन्म मरण के चक्र में फंसा देता है स्वार्थ व्यक्ति को आत्म केंद्रित और दूसरों की भलाई के प्रति उपेक्षा करने वाला बनाता है जिससे वह क्रूर और मानसिक रूप से अशांति हो जाता है स्वार्थ को एक मूर्खतापूर्ण जीवन दृष्टि कोण माना जाता है।

व्यक्ति का मनोरंजन पर ध्यान ' आत्म रंजन पर ध्यान नहीं :- मुनिश्री 

 मुनिश्री मंगल नंद सांगर जी ने कहाँ मनुष्य आजकल मनोरंजन पर ध्यान अधिक देता है सारा अमूल्य समय वर्वाद करता है समय का महत्व नही समझता जब कि जीवन को सफल बनाने के लिए आत्म रंजन के लिए भजन पूजन एवं शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए तभी मनुष्य का जीवन सार्थक है । 

मुनिश्री मंगल नंदसागर जी ने एक उदाहरण देते हुए कहाँ :- फूटी आँख विवेक की क्या करै जगदीश रामकली को तीन सौ रामलाल को तीस, मुनिश्री ने कहाँ मनोरंजन करने वाली रामकली तो तीन सौ रुपये दिए एवं मनुष्य कथा करने वाले को सात दिन के तीस रुपये दिए व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम दौर में क्या होगा उसका आत्म रंजन नही कर पा रहा है। 

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