हकीकत की जमीन पर कितना खरा उतरा मोदी सरकार का तीसरा आम बजट?



केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को लोकसभा में नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का तीसरा आम बजट पेश किया। इसके साथ बजट पर चर्चा शुरू हो गई कि इस बजट में भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए। क्या कदम उठाए जाने जरूरी थे। इस बजट के निहितार्थ क्या हैं।


क्या लोकलुभावन राजनीति, चुनावी राजनीति से हटकर इस बार वाकई यथार्थ के धरातल पर आकर इस बजट को बनाने की कोशिश की गई है। क्या इससे आगे का वह रास्ता बनता हुआ दिखाई पड़ रहा है, क्योंकि यह हमेशा नहीं चल सकता है कि आप लगातार कर्ज लेकर घी पीते रहें। 


केंद्र सरकार के पास फैसले लेने की अधिक जगह होती है, राज्य सरकारों के पास उतनी जगह नहीं होती है। जब चुनाव में घोषणा की जाती है, तब कोई आर्थिक सर्वेक्षण सामने नहीं आता है, तब वित्त मंत्रालय कुछ नहीं बोलता है सबको पता है कि पैसा कहां से होगा। 

अब तो बजट सबके सामने है जिस भी सरकार की योजना आ रही है, उसका बजट खोलकर देख सकते हैं कि उनके पास पैसा कितना है तो यह एक तरह से कथनी और करनी में अंतर भी है लेकिन इस समय संकट है सरकार वह संकट महसूस कर रही है। 


यह बजट संकेत दे रहा है कि भारत ने जीडीपी के अनुपात में अपना कर्ज कम नहीं किया है। अगर केंद्र और राज्य सरकारों का कर्ज मिला लिया जाए। जनता का कर्ज भी मिला लिया जाए और कॉर्पोरेट का कर्ज भी मिला लीजिए। तो हम जीडीपी के अनुपात में 100 फीसदी से ऊपर बैठे हुए हैं या इसके आसपास हैं।  लेकिन जो आंकड़ा होता है उसमें सरकारों (केंद्र और राज्य) का सार्वजनिक कर्ज होता है। इसमें निजी कर्ज शामिल नहीं होता। उस संकट की झलक परोक्ष रूप से छिपाकर इस बजट में दिखती है। इसीलिए वित्त मंत्री ने इस बार राजकोषीय घाटा से ज्यादा यह कहा कि हम अगले पांच साल में जीडीपी के अनुपात में भारत का कर्ज घटाएंगे। यह उसी को रेखांकित करता हुआ दिखता है। 


आप मान सकते हैं कि एक देश की सरकार कर्ज में दबी हुई है। अगर राज्य सरकार अगर एक कंपनी हो और उसे बाजार में सूचीबद्ध (लिस्ट) किया जाए तो उनको कौन खरीदेगा। मतलब उनकी बैलेंसशीट में नुकसान दिख रहा होगा और वह पार्टी कर रही होगी। बिल्कुल वैसी स्थिति है। तो ये उस सुधार का बजट है। बहुत सारे अंतर्निहित सुधार हैं। बहुत सारे ऐसे भी उपाय हैं, जिनसे चीजें राजकोषीय स्तर पर ठीक होंगी। कई सारे दांव-पेंच हैं। लेकिन इसको आम लोगों का बजट नहीं माना जा रहा है। उनके लिए दिवाली का तोहफा पिछले साल सितंबर में आ चुका है। तो वह उत्सव हो गया। यह उसी उत्सव का असर है। यह उसी उत्सव का बिल है। 

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