30 साल से जंगल की जमीन पर काबिज सहरिया परिवारों की गुहार, बोले- पट्टा दो या बेदखली रोको - Kolaras

जूर गांव में वनाधिकार को लेकर गरमाया मामला, सरपंच के समर्थन के बाद प्रशासन से लगाई न्याय की गुहार

कोलारस/शिवपुरी। कोलारस तहसील के ग्राम जूर में करीब 30 वर्षों से वन क्षेत्र की जमीन पर काबिज सहरिया आदिवासी परिवारों के वनाधिकार का मामला अब जोर पकड़ता जा रहा है। लंबे समय से खेती-किसानी कर परिवार का भरण-पोषण कर रहे इन परिवारों ने बेदखली के खतरे के बीच वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत पट्टे दिए जाने की मांग उठाई है।

ग्रामीणों के अनुसार, ग्राम जूर की वन बीट सनवारा के मौजे की भूमि पर दर्जनों सहरिया परिवार करीब तीन दशक से खेती करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि यही जमीन उनकी आजीविका का प्रमुख सहारा है और यहां से हटाए जाने की स्थिति में परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।

झूठी शिकायतों से परेशान करने का आरोप

सहरिया परिवारों का आरोप है कि कुछ लोगों द्वारा उनके खिलाफ वन विभाग में लगातार शिकायतें की जा रही हैं और उन्हें जमीन से बेदखल करने का दबाव बनाया जा रहा है। ग्रामीणों ने कुछ स्थानीय लोगों के नाम लेते हुए शिकायतों को दुर्भावनापूर्ण बताया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

ग्रामीणों का कहना है कि छोटे बच्चों वाले इन परिवारों को यदि उनकी खेती से वंचित किया गया तो उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।

सरपंच ने भी उठाई आदिवासियों के हक की आवाज

मामले में ग्राम जूर के सरपंच दीपक रघुवंशी ने सहरिया आदिवासी परिवारों के समर्थन में आवाज उठाई है। उनके नेतृत्व में संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पूर्व में आवेदन सौंपे जाने की बात कही गई है।

बताया गया है कि वन विभाग के अलावा केंद्रीय मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया, क्षेत्रीय सांसद, विधायक महेंद्र यादव और शिवपुरी DFO को भी मामले से अवगत कराया जा चुका है।

अब प्रशासन से पट्टे की मांग

पीड़ित परिवारों और उनके समर्थकों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि वनाधिकार अधिनियम 2006 के प्रावधानों के तहत पात्र परिवारों के दावों की जांच कर उन्हें नियमानुसार वनाधिकार पट्टे दिए जाएं। साथ ही जब तक दावों पर विधिवत निर्णय न हो, तब तक उन्हें बेदखली से संरक्षण देने की मांग भी उठाई गई है।

इसके अलावा ग्रामीणों ने कथित रूप से झूठी शिकायतों के जरिए परेशान करने वालों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर, यदि आरोप सही पाए जाएं, तो नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

बड़ा सवाल—30 साल से खेती कर रहे परिवारों के दावे पर क्या होगा फैसला?

जूर गांव में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि तीन दशक से जमीन पर काबिज इन सहरिया परिवारों के वनाधिकार दावों की प्रशासन कब और कैसे जांच करता है। क्या पात्र परिवारों को वनाधिकार कानून के तहत उनका हक मिलेगा, या बेदखली का खतरा बना रहेगा? अब निगाहें जिला प्रशासन और वन विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।

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