मध्यप्रदेश- में विधानसभा चुनाव से पहले ही राजनेताओं में जुबानी दंगल तेज होता जा रहा है, कोई किसी को डमरू बजाने वाला बता रहा है तो कोई मदारी तक पहुंच रहा है। मतदाता तो राजनीतिक शिकारी (राजनेता) के लिए शिकार से कम नहीं है। यही कारण है कि सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी हो या विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने तरह से जाल फैलाने में लगे हैं, और चाहते हैं कि शिकार उसके जाल में ही फंसे। राजनेताओं के बयानों को सुनकर एक कहानी याद आ जाती है, जो बचपन में हर किसी ने पढ़ी नहीं तो, सुनी जरूर होगी, जिसमें तोते कहते हैं कि शिकारी आएगा, जाल फैलाएगा और हमें उसमें फंसना नहीं चाहिए, फिर भी फंस जाते हैं। जाल में फंसने के बाद भी तोते यही दोहराते रहते हैं, क्योंकि उन्हें एक महात्मा ने ऐसा बताया था। तोते तो रटने वाले थे, वे अर्थ नहीं जानते थे। देश के मतदाताओं का भी उन तोतों से हाल कम नहीं है।मध्य प्रदेश में चुनाव करीब है, राजनेता तरह-तरह से जाल फैला रहे हैं, वादे कर रहे हैं, अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं तो कोई राज्य और केंद्र सरकार की नाकामियां गिनाने में लगा है। इसके चलते मतदाता यही कह रहा है कि, उन्हें फंसना नहीं है, मगर वे राजनेताओं के जाल में फंसने से बच पाएंगे, इसमें संदेह की गुंजाइश कम ही है, क्योंकि सरकार तो किसी एक दल की बनेगी ही। दोनों दलों के चुनावी जुमले जारी हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है, दोनों ही दलों की कोशिश है कि मतदाता उसके जाल में ही फंसे, किसी भी कीमत पर बचने न पाए। चार महीने बाद होने वाला विधानसभा चुनाव मतदाताओं के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी है।
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