श्रीं बांके बिहारी जी के प्राकट्य दिवस की हार्दिक बधाई
श्री बिहार पंचमी: वृंदावन में 19 दिसंबर को मनाया जाएगा श्री बांके बिहारी जी का प्राक्टय उत्सव
मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन आयोजित होने वाला यह उत्सव सारस्वत - कुल - कमल - दिवाकर, आशुधीरात्मज, रसिक अनन्य-नृपति स्वामी श्री हरिदास जी के उपास्य और जन-जन के परमाराध्य ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज का प्राकट्य-दिवस है । संवत् 1560 विक्रमी में स्वामी हरिदास अपने पिता श्री आशुघीर जी से युगल-मंत्र की दीक्षा लेकर विरक्त होकर वृंदावन चले आए और यमुना-तट के सधन वन-प्रान्तर में जिस स्थान को अपनी साधना का केंद्र बनाया, आज यह स्थान "निधिवन" के नाम से विख्यात है । इसी निधिवन में संवत 1562 विक्रमी में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन स्वामी हरिदास की रस-साधना के फलस्वरूप श्री बांके बिहारी जी महाराज के स्वरूप का प्राकट्य हुआ।
निधिवन स्वामी जी और श्री बाँके बिहारी जी महाराज की जय - जयकार से गूँज उठा
प्राकट्य के उपरांत श्री बिहारी जी महाराज निधिवन में एक लता-मंडल में विराजमान होकर गोस्वामी जगन्नाथ जी द्वारा सेवित हुए । 1921 विक्रमी में श्री बाँके बिहारी जी महाराज का वर्तमान मन्दिर बनकर तैयार हुआ जिसमें मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी ,शनिवार के दिन ( 10 दिसंबर 1864)श्री बाँके बिहारी जी महाराज विराजमान हुए । इस दिन श्री बिहारी जी के मंदिर तक स्वामी हरिदास जी महाराज की सवारी अत्यन्त धूमधाम के साथ आती है । इस सवारी में स्वामी हरिदास जी महाराज एक भव्य रथ में विराजमान होते हैं। माई री सहज जोरी प्रगट भई , जु रंग की गौर-स्याम घन-दामिनि जैसैं । प्रथमहुँ हुती, अबहुँ , आगैं हूँ रहिहै न टरिहै तैसैं । अंग-अंग की उजराई गहराई चतुराई सुन्दरता ऐसैं। श्री हरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी सम वैस-वैसैं।
इस दिन के विशेष आकर्षण
ठाकुर जी को अर्पित विशेष भोग एवं पोशाक, बाल रूप में ठाकुर जी का पीत ( पीले रंग) वस्त्रो के साथ स्वर्ण आभूषण से श्रृंगार, अनेक तरह के फूलों से मंदिर की सजावट, मेवा युक्त हलवे का भोग एवं 56 भोग होते हैं।।
