आज के श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि कर्म को समझ पाना अत्यंत कठिन कार्य है। और फिर वे कर्म के प्रकार विस्तार से समझा रहे हैं।
📖 श्लोक: "कर्म की बारीकियों को समझना अत्यंत कठिन है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह यह ठीक से जाने की कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है।"
🍁 भगवान श्रीकृष्ण कर्म के मुख्य 3 प्रकार बता रहे हैं, जो कि इस प्रकार हैं:
🍁 1. कर्म: सभी प्रकार के उद्यम (कार्य करना) कर्मों के अंतर्गत आते हैं। ये कर्म "फलों की इच्छा से प्रेरित होकर स्वयं को फलों का कर्ता और अधिकारी मानकर" किये जाते हैं। इस प्रकार के कर्म आगे और नए कर्मों का निर्माण करते रहते हैं तथा बंधन का कारण होते हैं। 😌
🍁 2. अकर्म: ये वे उद्यम (कार्य/प्रयास) होते हैं, जो "निष्काम भावना से प्रेरित होकर भगवान को सर्वस्व मानकर उन्हें ही कर्ता और फलों का असली अधिकारी मानकर" किये जाते हैं।
▪️और मनुष्य स्वयं को केवल निमित्त मात्र समझता है।
▪️ये कर्म भगवान श्रीहरि के निहित होने के कारण आगे
और कोई नवीन कर्म उत्पन्न नहीं करते, तथा सभी बंधनों
से मुक्ति की ओर चलते हैं।
🍁 3. विकर्म: ये वह ग्रहित कर्म होते हैं, जो "शास्त्रों के और मानव समाज के विरुद्ध होते हैं"।
▪️इस जगत में और जीवों को भी कष्ट पहुँचाते हैं।
▪️ये दुःख, विषाद और अत्याधिक भारी भव बंधन और
कई प्रकार के नवीन कर्म उत्पन्न करते हैं।
▪️ये दूसरों को दुख देने की भावना से प्रेरित होते हैं। इनका
मुख्य परिणाम दुख और संताप ही होता है।
🍁 उपरोक्त सभी प्रकार के कर्मों को जान कर ही हम यह तय कर सकते हैं कि हम इस समय किस प्रकार के कर्मों में लिप्त हैं?
🍁 जब तक हमें यह पता ही नहीं कि सही और गलत कर्म कौन से हैं, तब तक हम अपने आपको सही मार्ग या दिशा नहीं दे सकते।
🍁📖 भगवद भक्ति "अकर्म भाव" के कर्म करने का मार्ग दिखाती है और श्रीकृष्ण की शरण में सभी कार्य उनके ही निहित होते हैं।
~ श्रीमद् भगवद् गीता
द्वारा - श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
चित्र: इस्काॅन मंदिर।