प्रभु संकीर्तन - भगवान कहते हैं सब कुछ मुझ पर छोड़ जीवन जियो। पढिये अति अति सुंदर प्रवचन नानक कहते हैं,उपाय एक ही है कि उसके हुक्म और उसकी मर्जी के अनुसार सब उस पर छोड़ दो। जैसा वह जिलाए, जीयो। जैसा वह कराए, करो। जहां वह ले जाए, जाओ। उसका हुक्म तुम्हारी एक मात्र साधना हो जाए। तुम अपनी मर्जी हटाओ। उसकी मर्जी को आने दो।
तुम स्वीकार कर लो जीवन जैसा हो। परमात्मा ने दिया है, वही जाने। तुम इंकार मत करो। दुख आए तो दुख को भी स्वीकार कर लो कि उसकी मर्जी। और अहोभाव रखो, धन्यभाव रखो कि अगर उसने दुख दिया है तो जरूर कोई राज होगा, कोई अर्थ होगा, कोई रहस्य होगा। तुम शिकायत मत करो। तुम धन्यवाद से ही भरे रहो। वह तुम्हें जैसा रखे। गरीब, तो गरीब। अमीर, तो अमीर। सुख में, तो सुख में। दुख में,तो दुख में। एक बात तुम्हारे भीतर सतत बनी रहे कि मैं राजी हूं। तेरा हुक्म मेरा जीवन है।
और तब तुम अचानक पाओगे कि तुम शांत होने लगे। जो लाख ध्यान में बैठ कर नहीं होता था वह उसकी मर्जी पर सब छोड़ देने से होने लगा। हो ही जाएगा। क्योंकि चिंता का कोई कारण न रहा। चिंता क्या है? चिंता यह है कि जैसा हो रहा है उससे अन्यथा होना चाहिए। बेटा मर गया, नहीं मरना था; यह चिंता है। दिवाला निकल गया, नहीं निकलना था;
यह चिंता है। जैसा हुआ, वैसा नहीं होना था; और जैसा हो रहा है, वैसा नहीं होना चाहिए। तुम अपनी मर्जी को थोपने की कोशिश कर रहे हो जीवन पर। यही तुम्हारी चिंता है। फिर इससे तुम परेशान हो। फिर इस परेशानी को भीतर ढोते हुए तुम ध्यान करने बैठते हो। तब तुम खेत में फसल काटोगे, काबुल में घोड़ा खरीदोगे। वह चिंता तुम्हारी जो थी, पीछे रहेगी। वह तुम्हारे ध्यान को भी विकृत कर देगी। तब तुम कैसे शांत हो सकोगे?
शांति का एक ही गुर है। और अगर यह सूत्र तुम्हें ठीक से समझ में आ जाए, तो पूरब की सारी खोज समझ में आ सकती है। पूरब की सारी खोज यह है, लाओत्से से ले कर नानक तक, कि जो हो रहा है उसे स्वीकार कर लो। टोटल एक्सेप्टीबिलिटी।
इसका पुराना नाम भाग्य है। दूसरे शब्दों में सब हमारे कर्मो के फल है।वह शब्द बिगड़ गया। कोई भी शब्द बहुत दिन उपयोग करने से बिगड़ जाते हैं। क्योंकि गलत लोग उपयोग करते हैं, गलत अर्थ जुड़ जाते हैं। अब तो किसी की निंदा करनी हो तो कह दो कि भाग्यवादी है। लेकिन भाग्य...यही तो अर्थ है भाग्य का।नानक कहते हैं, हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि।
जो लिखा है वह होगा। जो उसने लिख रखा है वही होगा। अपनी तरफ से कुछ भी करने का उपाय नहीं है। कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। फिर चिंता किसको?
फिर बोझ किसको? जब तुम बदलना ही नहीं चाहते कुछ, जब तुम उससे राजी हो,
उसकी मर्जी में राजी हो, जब तुम्हारी अपनी कोई मर्जी नहीं, तब कैसी बेचैनी! तब कैसा विचार! तब सब हलका हो जाता है। पंख लग जाते हैं। तुम उड़ सकते हो उस आकाश में, जिस आकाश का नाम है--इक ओंकार सतनाम। नानक की एक ही विधि है। और वह विधि है, परमात्मा की मर्जी। वह जैसा करवाए। वह जैसा रखे।
ऐसा हुआ कि बल्ख का एक नवाब था, इब्राहीम। उसने बाजार में एक गुलाम खरीदा। गुलाम बड़ा स्वस्थ, तेजस्वी था। इब्राहीम उसे घर लाया। इब्राहीम उसके प्रेम में ही पड़ गया। आदमी बड़ा प्रभावशाली था। इब्राहीम ने पूछा कि तू कैसे रहना पसंद करेगा? तो उस गुलाम ने मुस्कुरा कर कहा, मालिक की जो मर्जी। मेरा कैसा, मेरे होने का क्या अर्थ? आप जैसा रखेंगे वैसा रहूंगा। इब्राहीम ने पूछा, तू क्या पहनना, क्या खाना पसंद करता है?
उसने कहा, मेरी क्या पसंद? मालिक जैसा पहनाए, पहनूंगा। मालिक जो खिलाए, खाऊंगा। इब्राहीम ने पूछा कि तेरा नाम क्या है? हम क्या नाम ले कर तुझे पुकारें? उसने कहा, मालिक की जो मर्जी। मेरा क्या नाम? दास का कोई नाम होता है?
जो नाम आप दे दें, कहते हैं, इब्राहीम के जीवन में क्रांति घट गई। उठ कर उसने पैर छुए इस गुलाम के और कहा कि तूने मुझे राज बता दिया जिसकी मैं तलाश में था। अब यही मेरा और मेरे मालिक का नाता। तू मेरा गुरु है। तब से इब्राहीम शांत हो गया। जो बहुत दिनों के ध्यान से न हुआ था, जो बहुत दिन नमाज पढ़ने से न हुआ था, वह इस गुलाम के सूत्र से मिल गया।सारांश यही है उस परमात्मा के निर्णय में दोष न निकालो,उसे सहर्ष स्वीकार कर लो,फिर मन में कभी दुख सुख का भेद नहीं होगा।जय जय श्री राधे कृष्णा जी।श्री हरि आपका कल्याण करें।(साभार:अज्ञात)