बैड़ारी अतिक्रमण मामले में 'झूठ' कौन बोल रहा? वन विभाग का दावा 150 बीघा कराई गई अतिक्रमण मुक्त जबकि, ग्रामीण बोले-मात्र 50 बीघा - Kolaras


सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में करीब 80 से 90 बीघा का भारी अंतर; कागजी वाहवाही या ग्रामीणों का छुपाव? क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म

पीड़ितों का नाले वाला विवाद भी गहराया संयुक्त सीमांकन में सिर्फ 50 से 60 बीघा जमीन ही वन क्षेत्र में आने की बात, तो 150 बीघा का आंकड़ा कहां से आया?

हरीश भार्गव, सर्वेश राजपूत कोलारस - कोलारस वन परिक्षेत्र के ग्राम बेड़ारी (सनवारा बीट) में प्रशासन द्वारा की गई अब तक की सबसे बड़ी अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई अब दावों और प्रतिदावों के दलदल में फंसकर पूरी तरह विवादों में घिर गई है। एक तरफ जहां प्रशासनिक अमला 150 बीघा वन भूमि को मुक्त कराने का डंका पीट रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों ने सरकारी आंकड़ों की हवा निकाल दी है। आंकड़ों के इस 'शह-मात' के खेल ने अब यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर अपनी पीठ थपथपाने के लिए झूठ कौन बोल रहा है—कागजों पर आंकड़े चमकाता प्रशासन या जमीन से जुड़े ग्रामीण?


क्या है पूरा मामला और प्रशासनिक दावा?
आधिकारिक तौर पर जारी प्रेस नोट और कार्यालय उपवनमंडलाधिकारी, उप वनमंडल करैरा के आदेश  के अनुसार, बीट सनवारा के कक्ष क्रमांक आरएफ 127 एवं 129 में अनिल जादौन, सुखराम सिंह यादव, बादाम यादव, उत्तम यादव, रिंकू यादव आदि द्वारा लगभग 23 हेक्टेयर (यानी करीब 115 से 150 बीघा) वन भूमि पर अवैध कब्जा किया गया था।

इस आदेश के पालन में मंगलवार को वन विभाग, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व  और तहसीलदार कोलारस की संयुक्त टीम ने 3 जेसीबी और 2 ट्रैक्टरों की मदद से भारी पुलिस बल के साए में बेदखली की कार्रवाई की। प्रशासन का दावा है कि उन्होंने पूरे 150 बीघा क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कराकर वहां कंटूर ट्रेंच (खाई) खोद दी है।


ग्रामीणों का पलटवार "मुश्किल से 60-70 बीघा ही थी जमीन, आंकड़े बढ़ा रहा प्रशासन"

दूसरी ओर, इस कार्रवाई के बाद से ही बेड़ारी और आसपास के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों ने प्रशासन के 150 बीघा के दावे को सिरे से नकारते हुए कहा कि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मौके पर मुश्किल से 50 से 60 बीघा जमीन से ही अतिक्रमण हटाया गया है। प्रशासनिक दावों और ग्रामीणों की बात में करीब 90 बीघा का एक बड़ा अंतर सामने आ रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी वरिष्ठ कार्यालयों में अपनी कार्रवाई को बहुत बड़ा दिखाने और वाहवाही लूटने के लिए आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं।


नाले का फेर और सीमांकन का असली सच
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब प्रभावित किसान सुगर सिंह,अनिल जादौन, नरेंद्र पाल और मुरारी आदिवासी, बादाम  यादव,उत्तम यादव,रिंका यादव ने वन विभाग पर उनकी निजी हक की जमीन छीनने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि  सर्वे नंबर 548 (अनिल जादौन), 547 (नरेंद्र पाल) और 546 (मुरारी आदिवासी) की जमीन पूरी तरह राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज उनकी निजी भूमि है।

इस जमीन और फॉरेस्ट की जमीन के बीच एक प्राकृतिक नाला बहता है। नाले के उस पार वन विभाग है और इस पार राजस्व विभाग। लेकिन विभाग जबरन नाले के इस पार आकर कार्रवाई कर रहा है।

सीमांकन की रिपोर्ट ने उलझाया मामला

चौंकाने वाली बात यह है कि जब वन विभाग और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने मौके पर सीमांकन (नाप-जोख) किया, तो इन तीनों खातों की मात्र 50से 60बीघा (अनुमानित) जमीन ही वन विभाग के दायरे में पाई गई जिस पर वन विभाग ने कब्जा लिया। अब सवाल यह उठता है कि अगर संयुक्त सीमांकन में विवादित जमीन सिर्फ 50से 60बीघा ही पाई गई, और ग्रामीणों के अनुसार कुल कार्रवाई ही 60-70 बीघा पर हुई, तो फिर प्रशासन के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज 
150 बीघा का जादुई आंकड़ाकहां से आया?

मुस्तैद रहा भारी अमला, पर सुलग रहे हैं सवाल
इस पूरी कार्रवाई के दौरान मौके पर भारी प्रशासनिक लवाजमा मौजूद था, जिसमें राजस्व निरीक्षक (आरआई) महेन्द्र कोरकू, पटवारी स्वाति शिवहरे, लोकेन्द्र धाकड़, शुभम शर्मा, विपिन भदौरिया  सहित तेंदुआ, कोलारस और बदरवास थाने का संयुक्त पुलिस बल तैनात था।

बल के बूते कार्रवाई तो शांतिपूर्ण निपट गई, लेकिन आंकड़ों का यह अंतर्विरोध अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। इलाके के लोग अब खुलकर पूछ रहे हैं कि यदि ग्रामीण सच बोल रहे हैं तो क्या प्रशासन ने कागजी कोरम पूरा किया है? और यदि प्रशासन सच कह रहा है, तो बाकी की जमीन कहां गायब है? इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच ही अब सच सामने ला सकती है।

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