विश्व पर्यावरण दिवस विशेष दिखावा नहीं, अब करना ही होगा पर्यावरणीय नैतिकता का पालनप्त



कोलारस - शुक्रवार 5 जून को दुनिया भर में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है! युक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के प्रति राजनीतिक व सामाजिक जागरूकता लाने हेतु इस दिन को पर्यावरण दिवस मनाने की घोषणा 1972 में की गई थी! किंतु हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारा भारतीय दर्शन तो इससे सदियों पहले, प्राचीन काल से ही पर्यावरण के प्रति जागरूक रहा है! हमारे भारतीय दर्शन ने पर्यावरण को ईश्वरीय के प्रतिरूप में स्वीकार कर पूजनीय व संरक्षणीय माना है। यह संयोग ही है, कि पर्यावरण दिवस और वट सावित्री पूर्णिमा व्रत साथ-साथ हैं। विवाहित महिलाएं दीर्घ सुखद वैवाहिक जीवन की कामना से अमरत्व व विशालता के प्रतीक वट वृक्ष की पूजा अर्चना करेंगीं। इसी से हम समझ सकते हैं कि पर्यावरण संरक्षण का भारतीय दर्शन इतना व्यवहारिक है कि यह हमारी जीवनशैली और परंपराओं से अभिन्न रूप से जुडा हुआ है। सूर्य, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, वनस्पति,सरिताओं और सरोवरों की पूजा हमारी परंपरा रही है, जिसके मूल में पर्यावरण संरक्षण ही भाव रहा है। किंतु स्वार्थवश आज हम इस दर्शन से कोसों दूर हो गए हैं। लालच से वशीभूत,विकास की अंधी दौड में शामिल मानव प्रकृति को संसाधन मान बैठा है! एक और पर्यावरणविद् चिंतित हैं, हम एक पेड लगाकर आनंद का अनुभव करते हैं कि हमने प्रकृति को कुछ वापिस दिया। वहीं दूसरी ओर वनों की हरियाली लूटी जा रही है, रेत के लिए नदियों की कोख छलनी की जा रही है, खनिज संपदा के लिए रात-दिन धरती का सीना चीरा जा रहा है। संसाधनों की खुली लूट चल रही है। यह छिपा नहीं है कि आज प्राकृतिक संपदा का दोहन अब बड़े लोगों का व्यवसाय है। प्रकृति किसी के लिए आस्था का विषय है,तो किसी के लिए धंधे का हाल ही में केंद्र सरकार ने कोयला खदानें निजी क्षेत्र के लिए खोलने की घोषणा की है... इसे क्या समझा जाए। क्या निजी क्षेत्र पर्यावरण की परवाह करेगा। उसके लिए तो यह धंधा है! विज्ञान के मद में हम माँ के समान जीवनदायिनी प्रकृति को दासी समझ बैठे ! हम भूल गए कि हमारा खानपान, हमारी साँसें पर्यावरण पर निर्भर हैं ! वर्तमान कोरोना त्रासदी ने प्रकृति ने विज्ञान को उसकी हद दिखा दी है...उसने हमें घर में कैद कर दिया ! थम गए मेट्रो... बुलेट ट्रेनें और कारखाने ! अब हमें सँभलना होगा और प्रकृति की भी सुनना होगा...अन्यथा परिणाम के लिए तैयार रहें! ग्लोबल वार्मिंग के चलते संपूर्ण विश्व का अस्तित्व खतरे में है। जिस धरा पर हम रहते हैं... जिस हवा में  हम साँस लेते हैं. जिस जल की वजह से हमारा अस्तित्व है, क्या उसकी रक्षा हमारा दायित्व नहीं है? क्या यह केवल सरकारों का दायित्व है ? नहीं , हमें पर्यावरण के प्रति अपने नैतिक दायित्व को भी समझना होगा ! इसके लिए जरूरी है कि हम पर्यावरणीय नैतिकता को जीवन पद्धति का अंग बनाए। वृक्षारोपण को अपना शौक बनाया जाए। कृषि और उद्योगों में पर्यावरण हितैषी पद्धतियों तकनीकों का प्रयोग करें और सरकारों, सरकारी तंत्र को भी नीति निर्माण और क्रियान्वयन के स्तर पर सचेत बनाए रखने के लिए दबाव बनाते रहें ! यहाँ महात्मा गांधी के कथन की चर्चा समीचीन है। प्रकृति हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है,लालच की नहीं हमें हमारी ही आवश्यकताओं की पूर्ति व जीवन के अस्तित्व की रक्षा के लिए प्रकृति को सहेजना होगा। 

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