कोलारस - कोलारस के अंतर्गत आने वाले ग्राम अनंतपुर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस श्री सुदामा चरित्र के पावन अवसर पर आचार्य श्री बृजभूषण जी महाराज ने बताया कि जो मित्र एवं भाई संकट के समय भी अपने साथ खड़ा रहता है उसी को सच्चा हितैषी जानना चाहिए एवं उसी को सच्चा मित्र समझना चाहिए परन्तु जो व्यक्ति सुख में तो साथ देते हैं लेकिन विपत्ति के समय अपना साथ छोड़ जाते हैं ऐसे मनुष्य पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे मनुष्य तब तक अपने साथ रहते हैं जब तक अपने पास धन है और हम सुखी है।
ऐसे लोगों को परम स्वार्थी समझना चाहिए आचार्य जी ने बताया कि सुदामा जी पर जब संकट आया और सुदामा जी भगवान के पास गए तो भगवान श्री कृष्ण ने उनको अपना परम मित्र समझ करके उनके लिए सुदामापुरी दे डाली और स्वर्ग लोक जैसा सुख उनके घर में भर दिया और उनके लिए अनंत संपत्ति प्रदान की ,मित्र को देखकर के मित्र दुखी हो जाए यही सबसे बड़ा उसकी मित्रता का प्रतीक है, जो अपने मित्र को देखकर के दुखी नहीं होता ऐसे व्यक्ति को देखने से भी पाप लगता है।
रामायण मैं चौपाई हैं ""जो न मित्र दुख होय दुखारी,, तिनहि विलोकत पातक भारी ''आचार्य ने कथा के प्रसंग में सुंदर चौबीस गुरुओं की कथा सुनाई और बताया की सभी को अपने जीवन में गुरु बनाना चाहिए गुरु के बिना मुक्ति संभव नहीं है क्योंकि गुरु के बिना कोई भी सदमार्ग नहीं बता सकता ,इसलिए जहां से शिक्षा मिले वहीं से शिक्षा ग्रहण करना चाहिए और जो हमको शिक्षा दे उसी को अपना गुरु बनाना चाहिए क्योंकि दत्तात्रेय मुनि ने जहां-जहां से शिक्षा ग्रहण की उसको अपना शिक्षा गुरु उन्होंने बनाया है।
इसलिए मानव का कर्तव्य है की अपने जीवन में अवश्य किसी व्यक्ति को गुरु बना ले कथा के अंत में सुंदर भगवान की अन्य लीलाओं का वर्णन किया और बताया कि परीक्षित जी को मुनि का श्राप लगा था तो उनको तक्षक सर्प काटने के लिए आया और उसी के डसने से परीक्षित महाराज का मोक्ष हुआ राजा जनमेजय सर्प यज्ञ किया और यज्ञ में सर्प जलाकर के मरने लगे तब आस्तिक मुनि ने आ करके सबको बचाया है ,इसके बाद में व्यास पीठ का सभी यजमानों ने पूजन किया एवं सुंदर आरती की गई।
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